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आगरा के लेखक राज गोपाल वर्मा को उत्तर प्रदेश शासन द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान से सम्मानित करने की घोषणा

आगरा के लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा को उत्तर प्रदेश शासन ने रु एक लाख मूल्य के पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की है.

सरकार ने इस पुरस्कार का चयन मेरठ जिले के सरधना कस्बे की तत्कालीन जागीरदार फरजाना उर्फ़ बेगम समरू के व्यक्तित्व और कृतित्व पर लिखी श्री वर्मा की मौलिक कृति ‘बेगम समरू का सच’ पर किया है. इस हेतु गठित उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान, लखनऊ की समिति की गत दिवस हुई संस्तुति पर वर्ष २०२०-२१ के लिए उनकी गद्य पुस्तक पर यह पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है.

यह पुरस्कार सम्मान समारोह संस्थान के ‘वार्षिक पुरस्कार एवं सम्मान समारोह’ में आगामी १४ मार्च २०२१ को लखनऊ के कैसरबाग क्षेत्र में स्थित भातखंडे संगीत महाविद्यालय के सामने ‘कलमंडपम सभागार’ में आयोजित होगा.

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार तथा उत्तर प्रदेश सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के सूचना, जनसंपर्क और प्रकाशन विभागों में जिम्मेदार पदों पर तैनाती के दौरान उन्होंने एक लेखक के रूप में अपनी पूर्व में ही पहचान बनाई थी, परन्तु किसी पुस्तक-लेखन के रूप में यह किताब उनका प्रथम प्रयास ही था. उनका कहना है कि यह एक ऐसी शोधपरक किताब बन पड़ी है, जिसके लिए उन्होंने सरधना की उस प्रभावशाली जागीरदार बेगम समरू के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पहलुओं पर गहनता और खोजपूर्ण ढंग से काम किया. इस प्रकार ऐसी कृति का सृजन हुआ, कि जिस महिला ने राष्ट्र के संक्रमण काल में ५८ वर्ष तक कुशलतापूर्वक शासन किया था, उसके वास्तविक इतिहास को जाना जा सके. प्रमाणिक इतिहास को ध्यान में रखने के कारण यह पुस्तक बेगम समरू को लेकर जनमानस में फैली तमाम भ्रांतियों का निवारण होने में तो कारगर है ही, उनके जीवन के विभिन्न अनछुए पहलुओं का एक ईमानदार आकलन कर वास्तविकता को सामने लाने के सकारात्मक प्रयास के रूप में भी देखी जा सकती है.

संवाद प्रकाशन, मेरठ के कार्यकारी आलोक श्रीवास्तव के सम्पादन में प्रकाशित, २७६ पृष्ठों की इस पुस्तक की भूमिका कई राष्ट्रीय समाचारपत्रों के सम्पादक रह चुके शम्भूनाथ शुक्ल ने लिखी है, जिनका कहना है कि राजगोपाल सिंह वर्मा ने बेगम समरू का इतिहास लिखते समय उपन्यास की शैली का लालित्य लेकर भी इतिहास के तारतम्य को बनाये रखा है. उन्होंने इस साहस, धैर्य और शोध की सराहना करते हुए लिखा कि, ‘अत्यंत श्रम के साथ लिखा गया बेगम समरू का यह इतिहास, इतिहासकारों की मेरिट से इतर अपने आप में बेजोड़ है’.

राजगोपाल सिंह वर्मा की इस पुस्तक की देश-विदेश की प्रमुख साहित्यिक और ऐतिहासिक पत्र-पत्रिकाओं ने समीक्षाएं और चर्चायें प्रकाशित कर सराहना की है. पत्रकारिता तथा इतिहास में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त श्री वर्मा को केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में प्रकाशन, प्रचार और जनसंपर्क के क्षेत्र में जिम्मेदार पदों पर कार्य का अनुभव है. उन्होंने कई वर्ष तक प्रदेश सरकार की साहित्यिक पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश’ का स्वतंत्र सम्पादन किया जबकि इससे पूर्व उनका उद्योग मंत्रालय तथा स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार में भी उनका सम्पादन का अनुभव रहा है.

इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद उनके एक सामाजिक विषय पर लिखे उपन्यास ‘३६० डिग्री वाला प्रेम’, ‘अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम (कहानी संग्रह)’, ‘इश्क… लखनवी मिज़ाज का (ऐतिहासिक प्रेम कहानियाँ)’ का प्रकाशन भी हुआ है. ‘गोरों का दुस्साहस’, ‘दुस्साहसी जॉर्ज थॉमस– यानि हाँसी का राजा’, ‘सिंधिया की जीत का यूरोपियन नायक: डी बॉयन’, ‘पहली औरत: राना बेगम’ और ‘पराक्रमी रानी दुर्गावती’ विषयक श्री वर्मा की कई अन्य किताबें भी प्रकाशनाधीन हैं.

श्री वर्मा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार-२०१९’ में श्रेष्ठ कहानी के पुरस्कार के विजेता रहे हैं. राष्ट्रीय समाचारपत्रों, पत्रिकाओं, आकाशवाणी और डिजिटल मीडिया में हिंदी और अंग्रेजी भाषा में समय-समय पर उनके लेखन, यथा कहनियाँ, कविताएँ लेखों को पढ़ा जा सकता है. ब्लागिंग तथा विभिन्न प्रकार की फोटोग्राफी उनकी रुचि के क्षेत्र हैं.

 

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