अंतरराष्ट्रीय

हसरत बेपर्दा

हिजाब पर विवाद मुस्लिम महिलाओं की मजहबी आजादी से जुड़ा विवाद नहीं, बल्कि इसके जरिए निशाना कुछ और है। एक ओर जहां मुस्लिम महिलाएं खुद निशाने पर हैं, वहीं भारतीय शासन व्यवस्था को चुनौती देने, और आखिरकार भारत पर इस्लाम को थोपने की सोच इसके पीछे काम कर रही है, ऐसे विवादों को जड़ से खत्म करने के लिए कितनी जरूरी है समान नागरिक संहिता

हिजाबपर विवाद कर्नाटक के उडुपी के एक प्री कॉलेज से प्रारंभ होकर पूरा भारत में छा गया है। इसे मुस्लिम महिलाओं की मजहबी आजादी से जोड़ा जा रहा है। मुस्लिम समाज का एक तबका इस पर अड़ा है कि मुस्लिम लड़कियों को विद्यालयों की कक्षाओं में हिजाब पहनने की आजादी मिले। हालांकि केरल उच्च न्यायालय 2018 के एक फैसले में पहले ही इस तरह की मांग को नकार चुका है और सामुदायिक स्वतंत्रता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर रखने की बात कह चुका है। अब कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे विवादों को जड़ से खत्म करने का उपाय समान नागरिक संहिता लागू करना ही है।

इस पूरे हिजाब प्रकरण में कुछ प्रश्न उभरते हैं। पहला तो यह कि आखिर मुस्लिम छात्राओं के हाथ में किताब देने के बजाय उन्हें हिजाब से ढकने के पीछे क्या सोच है? राजस्थान की आमना बेगम कहती हैं कि सऊदी के मजहबी गुरु शेख अहमद अल गामदी ने 2018 में ही साफ किया था कि महिलाओं को शालीन कपड़े पहनने चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अबाया (सिर से पांव तक की काले रंग की पोशाक) ही हो। आमना कहती हैं कि भारत में कभी ऐसा नहीं था। परंतु जब से सलाफियों का जोर बढ़ा है, मुस्लिम समाज में इस तरह की कट्टरता बढ़ी है। आमना बेगम कहती हैं कि इस घटना की शुरुआत के पीछे पीएफआई का नाम आ रहा है। उडुपी में हिजाब समर्थक लड़कियां उनसे जुड़ी बताई जाती हैं। वे भारत की बहुलवादी संस्कृति पर मजहबी रंग थोपना चाहते हैं। सरकार को ऐसे तत्वों के साथ कड़ाई से पेश आना चाहिए।

उधर मुस्लिम मुल्ला महिलाओं को बंधक या पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं, इस पर वाराणसी की नाजनीन अंसारी कहती हैं कि कुछ मुस्लिम नेता नहीं चाहते कि मुस्लिम महिलाएं आगे बढ़ें। हर मुस्लिम घर में सभी को कुरान पढ़ना होता है। वह अरबी में रटा जाता है। यदि मुस्लिम लड़कियां पढ़ेंगी तो उसका उर्दू तर्जुमा समझ सकेंगी। इससे कौम के ठेकेदारों के लिए दिक्कत पैदा हो जाएगी। इसलिए वे नहीं चाहते कि मुस्लिम लड़किया पढ़ें। इसीलिए उन्हें इस्लाम के नाम पर हिजाब जैसी चीजों के लिए भड़का कर उन्हें पिछड़ा बनाए रखने की चाल चली जाती है। कश्मीर की टॉपर लड़की अरुशा को इसीलिए कट्टरवादियों की ओर से धमकियां दी जा रही हैं।

यह विवाद उभरने के समय के पीछे भी कोई सोच है, इस पर वाराणसी की नजमा परवीन कहती हैं कि राम मंदिर निर्माण, तीन तलाक पर कानून से बौखलाए कुछ मुस्लिम कट्टरवादी मौके की ताक में थे। उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। कुछ लोग और पार्टियां इस बहाने मुस्लिम मतदाताओं की गोलबंदी करना चाहती हैं। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी, ओवैसी जैसे नेता विद्यालयों में हिजाब का समर्थन कर चुके हैं।

पोशाक विद्यालय का अनुशासन
विद्यालयों में हिजाब पहनने की मांग पर आमना बेगम कहती हैं कि तुर्की, सीरिया, इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देशों में तो विद्यालयों में हिजाब या बुर्का पहनने पर रोक है तो फिर भारत में यह मांग क्यों की जा रही है। वे साफ कहती हैं कि हर संस्था की अपनी पोशाक होती है, वह पोशाक वहां का अनुशासन होता है। यदि आप उस संस्था से जुड़ती हैं तो आपको उस संस्था की पोशाक संहिता को मानना होगा। उडुपी के उस विद्यालय में भी 75 मुस्लिम लड़कियां हैं परंतु हिजाब के लिए मात्र छह ल़ड़कियां ही हल्ला मचाए हैं। साफ है कि यह मुद्दा मुस्लिम महिलाओं का नहीं है।

नाजनीन ज्यादा आक्रोश में दिखती हैं। वे कहती हैं कि जब इस्लामी आक्रांताओं ने भारत पर हमले किए तो उन्होंने भी विश्वविद्यालयों को नष्ट किया, किताबें जलाईं। मुस्लिम कट्टरवादी मुस्लिम महिलाओं को कैद करके रखना चाहते हैं, उन्हें आगे नहीं बढ़ने देना चाहते। नजमा कहती हैं कि इन मुल्लाओं की इसी सोच के कारण मुस्लिम समाज शिक्षा के मामले में, सरकारी नौकरियों के मामले में, रोजगार के मामले में पिछड़ा हुआ है। आज विद्यालय में हिजाब पहनने की छूट देने की मांग हो रही है। यदि किसी मदरसे में कोई हिंदू लड़की अपने धार्मिक प्रतीकों को लाने की इजाजत मांगे तो आप देंगे क्या? विद्यालय पढ़ने के लिए हैं, मजहबी पहचान जताने के लिए नहीं।

पिछड़ा बनाए रखने की साजिश
आमना कहती हैं कि यह विवाद मुस्लिम लड़कियों के विरुद्ध है। यह उनकी पढ़ाई में, उनके आगे बढ़ने की राह में अड़चन डालने के लिए है। यह अशराफ तबके की पसमांदा तबके को पिछड़ा बनाए रखने की साजिश का हिस्सा है। आमना कहती हैं कि हिंदू समाज अपने ऊपर, अपने सुधार के लिए काम करता है तो आज वह हर क्षेत्र में आगे है। मुस्लिम समाज के रहनुमा सुधार की बात को शरिया के विरुद्ध बता कर बात खत्म कर देंगे। मुस्लिम समाज में भी जातियां हैं, उनके बीच भेदभाव पर बात क्यों नहीं होती। अल्पसंख्यक संस्थानों में पसमांदा को आरक्षण क्यों नहीं मिलता जबकि अन्य संस्थानों में पसमांदा को आरक्षण मिल जाता है, यह कैसी रीति है।

नजमा परवीन कहती हैं कि अशराफ घरों की लड़कियां महंगे विद्यालयों में जाती हैं जहां एसी लगे होते हैं। वे एक बार को हिजाब या बुर्का पहन भी सकती हैं। परंतु पसमांदा लड़कियां तो सरकारी विद्यालयों में पढ़ती हैं जहां एसी नहीं होता। वे बुर्के में गर्मी से निजात की कोशिशें करेंगी या पढ़ाई करेंगी।

मुस्लिम मुल्लाओं द्वारा हिजाब पहनने को मजहबी आवश्यकता बताने पर आमना बेगम कहती हैं कि शरिया में तो लड़कियों को आधी संपत्ति देने की बात भी कही गई है। मुल्ला उस पर क्यों नहीं बात करते। नाजनीन कहती हैं कि यदि शरिया मानना है तो पूरा मानो, फिर आपराधिक कानूनों में शरिया को छोड़ देश का कानून क्यों मानते हैं, वहां भी शरिया की बात करें। ये शरिया की केवल उन बातों को मानते हैं जो उनके हित में हैं।

समान नागरिक संहिता जरूरी
आमना कहती हैं कि भेदभाव मिटाने के लिए एक समान कानून जरूरी है। सरकार को इस पर सख्त होना पड़ेगा। इसी से मुस्लिम महिलाओं का पिछड़ापन खत्म हो सकता है। नाजनीन कहती हैं एक समान कानून होने पर ही मुस्लिम महिलाओं को पढ़ने, रोजगार करने और आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे। वे कहती हैं कि समान नागरिक संहिता लागू होने से मुस्लिम महिलाओं को अपने ऊपर थोपी जाने वाली तमाम नाजायज बंदिशों से छुटकारा मिल सकेगा और वे देश की एक सामान्य नागरिक की तरह अपनी क्षमताओं का स्वंतत्रता के साथ उपयोग कर पाएंगी। नजमा कहती हैं कि अगर सरकार इन कट्टरवादियों की मांग पर ढीली पड़ी तो इनकी मांगें बढ़ती ही जाएंगी। इसीलिए समान नागरिक संहिता लागू कर ऐसी नाजायज प्रवृत्तियों पर रोक लगानी होगी।

गफ्फार खान की पोती ने किया हिजाब का विरोध
खान अब्दुल गफ्फार खान की पोती यासमीन निगार खान ने हिजाब का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि स्कूलों में एक यूनिफॉर्म कोड का पालन जरूरी है। यदि चेहरे को बुर्का या फिर हिजाब से स्कूल परिसर में ढकेंगे तो वहां पहचान का एक मुद्दा बनेगा। यासमीन निगार खान कोलकाता में रहती हैं।

हिजाब पर मलाला की सोच उजागर
नोबल सम्मान प्राप्त पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई हिजाब विवाद में बेमांगी सलाह देकर सोशल मीडिया पर ट्रोल हो गईं। मलाला ने ट्वीट किया कि ‘कॉलेज हम पर दबाव डाल रहे हैं कि हम हिजाब अथवा तालीम में से किसी एक को चुन लें। हिजाब के साथ लड़कियों को स्कूल में न आने देना भयानक है। महिलाओं पर दबाव डाला जा रहा है, कम या ज्यादा कपड़े पहनने को लेकर’। ट्विटर पर लोगों ने उनकी पुस्तक ‘आई एम मलाला’ की याद दिलाई जिसमें उन्होंने लिखा था, ‘बुर्का पहनना ठीक वैसा ही है जैसे कोई बड़ी लबादे वाली शटलकॉक के अंदर चला जाए, जिसमें सिर्फ एक ग्रिल है, जिसके जरिए कोई बाहर देख सकता है। वहीं गर्मी के दिनों में तो यह एक भट्टी जैसा ही हो जाता है।’

 

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