
*‘जूनियर जितेंद्र’ आंशु कपूर जैसे कलाकारों की मौजूदगी से महफिल सजती है, लेकिन सम्मान और मंचीय अनुशासन भी उतना ही जरूरी*
कभी-कभी कुदरत भी ऐसी समानताएं रच देती है कि दो अलग-अलग इंसान, दो अलग-अलग जगहों पर रहते हुए भी एक ही शक्ल के नजर आते हैं। और जब किसी आम इंसान का चेहरा किसी मशहूर फिल्मी सितारे से मिल जाए, तो फिर उसकी पहचान सिर्फ उसके नाम तक सीमित नहीं रहती—लोग उसे उसी सितारे के नाम से पुकारने लगते हैं।
मुजफ्फरनगर की धरती से जुड़े ऐसे ही एक दिलचस्प किरदार हैं ‘जूनियर जितेंद्र’ के नाम से मशहूर आंशु कपूर । बेलबॉटम पैंट, वही अंदाज, वही जोश और चेहरे की जितेंद्र से मिलती-जुलती शक्ल ने उन्हें अपने आप में एक अलग पहचान दी। उम्र भले ढलान की ओर हो, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान, अंदाज और ऊर्जा आज भी किसी महफिल में चार चांद लगाने का माद्दा रखती है।

जहां भी आंशु मलिक पहुंचते हैं, लोगों की नजरें ठहर जाती हैं। कोई मुस्कुराकर उन्हें देखता है तो कोई आवाज लगाता है—“सर, एक सेल्फी प्लीज…” और देखते ही देखते वह लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं।
लेकिन किसी ऐसे कलाकार को जब किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाता है, तो उसके साथ सिर्फ मंच साझा करना ही पर्याप्त नहीं होता। उसके समय, कला और सम्मान का भी उतना ही ख्याल रखा जाना चाहिए।

हाल ही में खतौली के ऐतिहासिक मेले में आयोजित ‘याद-ए-रफी नाइट’ को लेकर भी कुछ ऐसे ही सवाल सामने आए। कार्यक्रम का नाम महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफी साहब की याद को समर्पित था, ऐसे में उम्मीद थी कि उनके जीवन, संगीत यात्रा और उनकी विरासत को भी मंच पर उचित स्थान मिलेगा। लेकिन कार्यक्रम की व्यवस्था और मंच संचालन को लेकर मौजूद कुछ लोगों ने सवाल उठाए कि क्या कार्यक्रम अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप पर्याप्त रूप से रफी साहब को समर्पित हो पाया?
दूर से आए कलाकारों और अतिथियों के लिए भी मंचीय समय और परिचय महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई कलाकार लंबा इंतजार करने के बाद अपनी कला प्रस्तुत किए बिना ही लौट जाए, तो यह केवल उस कलाकार की मायूसी नहीं होती, बल्कि आयोजकों के लिए आत्ममंथन का विषय भी बन जाती है।
आखिर मंच कलाकार के लिए सिर्फ रोशनी और माइक का नाम नहीं—मंच उसके सम्मान का स्थान भी होता है।
स्थानीय कलाकारों को अवसर मिलना निश्चित रूप से अच्छी बात है। अपने शहर और क्षेत्र की प्रतिभाओं को आगे बढ़ाना हर आयोजन की खूबसूरती हो सकती है। लेकिन जब किसी कार्यक्रम में बाहर से विशेष रूप से मेहमान कलाकार बुलाए जाएं, तो उनके लिए समय निर्धारित करना, उनका परिचय कराना और उन्हें सम्मानपूर्वक प्रस्तुति का अवसर देना भी आयोजन की गरिमा का हिस्सा है।
किसी भी बड़े आयोजन को सफल बनाने के लिए केवल कलाकारों की सूची काफी नहीं होती। एक जिम्मेदार और मजबूत आयोजन टीम, मंच संचालन की स्पष्ट व्यवस्था, अतिथियों के लिए समन्वय और समय का अनुशासन—ये सभी मिलकर किसी कार्यक्रम को मुकम्मल बनाते हैं।
और शायद यही इस पूरे प्रसंग से निकलने वाली सबसे बड़ी सीख है—
जिस महान कलाकार के नाम पर महफिल सजाई जाए, सबसे पहले उसी कलाकार की विरासत का अदब किया जाए।
जो मेहमान आपकी महफिल की रौनक बढ़ाने दूर से आए हैं, पहले उन्हें सम्मान दिया जाए।
फिर अपने स्थानीय कलाकारों को भी पूरा अवसर मिले।
क्योंकि कलाकार छोटा या बड़ा नहीं होता,
सम्मान छोटा या बड़ा जरूर हो सकता है।
और असल सभ्यता यही है कि
जो आपके मंच पर आए, वह लौटते वक्त यह महसूस करे कि उसे यहां सिर्फ बुलाया नहीं गया था—बल्कि दिल से सम्मान भी दिया गया था।



