राज्य

अखिलेश – जयंत की दोस्ती में सीटों के बंटवारे की दरार, सपा 36 सीटों से ज्यादा देने के मूड में नहीं

कृषि कानूनों की वापसी के साथ ही बदलते नजर आ रहे हैं राजनीतिक समीकरण

पश्चिम उत्तर प्रदेश क्षेत्र में  सपा और लोकदल में गठबंधन की तैयारी की चर्चा अखिलेश यादव और जयंत चौधरी दोनों कर रहे हैं, लेकिन मैं बड़ा तू छोटा, तू छोटा मैं बड़ा की राजनीति में सीटों के बंटवारे में दरार साफ दिखाई देने लगी है। खबर है कि जयंत चौधरी ने ‘जाट लैंड’ की 45 सीटों पर अपना गठबंधन की चाह रखी हुई है, जबकि अखिलेश यादव 36 सीट से ज्यादा देना नहीं चाहते। यूपी की राजनीति में अखिलेश इस बार कांग्रेस से दूरी बनाते हुए अलग-अलग क्षेत्रीय दलों से राजनीतिक गठबंधन बनाने की रणनीति बना रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने लोकदल के साथ हाथ मिलाने के लिए जयंत चौधरी के साथ कई बैठके की हैं। दोनों नेताओं ने बयान देकर ये माहौल जताने की कोशिश की है कि हम एक हो रहे हैं। मीडिया में भी अखिलेश खुलकर बोल रहे हैं कि उनका लोकदल से गठबंधन होने जा रहा है, लेकिन इस मामले में अभी तक जयंत चौधरी ने ज्यादा कुछ नहीं कहा है। जयंत के यही हाव भाव कहते हैं कि वो अभी गठबंधन के करीब नहीं हैं।

जानकारी के मुताबिक जयंत चौधरी ने अपने लोकदल पार्टी के लिए 45 सीटे मांगी है, जबकि अखिलेश ने केवल 36 सीटों के लिए ही अभी तक हामी भर रहे हैं। अखिलेश यादव पश्चिम यूपी के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र की 9 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करना चाहते हैं। खबर है कि अखिलेश ने ये भी सुझाया है कि 4 सीटों पर जयंत अपने उम्मीदवार खड़े कर लें, किंतु सिंबल सपा का लेकर चुनाव लड़े। इस बात को लेकर जयंत किसी भी सूरत में तैयार नही हैं और अखिलेश का यह प्रस्ताव उन्हें संशय में डाल गया है। उल्लेखनीय है कि यूपी की राजनीति में लोकदल और सपा की पहले भी ज्यादा पटरी नहीं खाई। मुलायम सिंह और अजीत सिंह की गठबंधन की राजनीति कभी भी परवान नही चढ़ी, अजीत सिंह यूपी के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन मुलायम सिंह बनने नहीं देते थे। इसी वजह से जयंत चौधरी भी अपना हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जाट लैंड में अखिलेश से ज्यादा जयंत चौधरी की जनसभाओं में भीड़ उमड़ती देखी गई है।

मुस्लिम, यादव और जाट वोट के भरोसे गठबंधन की चाह
जयंत चौधरी के साथ इस समय अपने पिता अजीत सिंह की मृत्यु के बाद सहानभूति भी बटोर रहे हैं। माना ये भी जाता है कि किसान आंदोलन के पीछे उनका राकेश टिकैत को मौन समर्थन रहा है। इस उम्मीद के साथ कि चुनाव में टिकैत परिवार जाट बिरादरी के नाम पर लोकदल की मदद करेगा। पिछली बार भी जाट वोट सपा को नहीं मिला था। अखिलेश यादव, जाट मुस्लिम गठजोड़ नहीं बना पाए और मोदी की हिंदुत्व लहर में जाट वोट बीजेपी ले गई। अब आगामी चुनावों में अखलेश मुस्लिम, यादव वोट और जयंत, जाट वोट के भरोसे गठबंधन चाहते हैं। दोनों अपने आप में अपने वोट बैंक का दावा करते हुए सीटों के बंटवारे में अड़े हुए हैं। यही वजह है कि अभी तक दोनों तरफ से गठबंधन की अधिकारिक घोषणा नहीं हो पा रही है।

जाटों में मोदी के प्रति फिर से बढ़ा विश्वास 
इधर राजनीतिक समीकरण, पीएम मोदी के द्वारा कृषि कानूनों की वापसी के साथ ही बदलते नजर आ रहे हैं। राकेश टिकैत भी सदमे में हैं और जयंत चौधरी भी, क्योंकि मोदी के इस कदम से जाटों में मोदी के प्रति फिर से विश्वास जाग गया है और मोदी विरोध की राजनीति ठंडी हो गई। पश्चिम यूपी में मुख्यमंत्री योगी की जनसभाओं में जो भीड़ देखी गयी है उसे देख फिर से बीजेपी अपने आप को मजबूत हालात में महसूस कर रही है। बहरहाल एक-दो हफ्ते में जयंत अखिलेश की जोड़ी बन पाएगी या नहीं इसकी तस्वीर साफ हो जाएगी। ये भी देखना है की सीटों के बंटवारे की लकीरें कहीं राजनीति के नए गुल भी न खिला दे।

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