स्पेशल

मैं चाहती हूँ के ये हादसा भी हो जाये।

 

ख़ुशी के रंग से चादर कोई भिगो जाये
मैं चाहती हूँ के ये हादसा भी हो जाये।

ज़रा सा नींद से मैं अपनी गुफ्तगू कर लूँ
उसे कहो के वो चुपचाप जा के सो जाये।

मुझे भी अच्छे से आता है तैरने का हुनर
है नाख़ुदा के न बस में मुझे डुबो जाये।

गुमान होने लगा आजकल मुझे ख़ुद पर
गुनाह कोई कहीं मेरे हाथो से न हो जाये।

बस एक ख़ौफ़ सताता है हर घड़ी मुझको
चमन में बीज न नफ़रत के कोई बो जाये।

मेरे मिज़ाज में शामिल नहीं दग़ाबाज़ी
उसे है जाना अगर छोड़ के! तो वो जाये।

तलाशती मैं रहूँ खुद को, उसमे हु प्रियंका ,
मैं चाहती हूँ के ख़ुद वो भी मुझमें खो जाये।
प्रियंका द्विवेदी।

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